वैसे भी भारत में उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए कौन आगे पढ़ता हैं, क्या दसवीं और क्या पीएचडी सब तो एक ही बराबर हैं क्योंकि जब ग्रुप डी या सी की भर्ती निकलती हैं तो सब के सब एक ही कतार में खड़े हो जाते हैं और जो बचे - खुचे संघर्षरत छात्र - छात्रा हैं वो ही एमफिल व पीएचडी के लिए निकलते हैं ताकि देश - समाज के लिए भी कल्याण हो. हाँ! यह बात अलग है कि कुछ लोग पीएचडी कर के भी पकौङे बेच रहे हैं और एम ए, एमफिल वालों की बात ही छोड़ो वो सब भी कहीं ना कहीं तो खङे मिल जाएंगे और इस बेरोजगार शहर में उम्मीद भी क्या कर सकते हैं क्योंकि यहां तो लोकतंत्र के राजा नौवीं पास हैं तो उन्हें क्या पता हैं कि उच्च शिक्षा नाम की भी कोई चीज होती हैं. अगर उन्हें यह बात पता होता कि शोध शिक्षा के वजह से ही समाज में विकास होगा और वास्तविक परिवर्तन आएगा तो आज फेलोशिप के लिए हमें गुहार ना लगानी पङती. हमारे नेताओं को यह जानकारी होनी चाहिए कि रिजर्व बैंक हो या अन्य विकास की योजना सब तो शोधकर्ताओं की ही देन हैं लेकिन उन्हें यह बात पता कैसे हो क्योंकि वो तो बस जाएंगे रिबन काटेंगे और बस अपने बातों को रखेंगे फिर चलते बनेंगे और हम बुध्दिजीवी बस अपनी बात को आपस में बुदबुदाकर चलते बनेंगे अपने - अपने काम पर. शिक्षा के महत्व को एक शिक्षित व्यक्ति ही समझ सकता हैं लेकिन यहां तो हमारे नेता ही अबूझ हैं तो भला उनको कौन समझाएं. इन लोगों से लाखगुना अच्छी हैं मेरी माँ जो कि अनपढ़ हैं और गरीबी तो खैरात में मिली हैं लेकिन वो अपने हिस्से का सुख त्याग कर के मुझे पढा रहीं हैं ताकि अच्छा इंसान बनूं. जाने कैसे उनको फेलोशिप वाले हङताल के बारे में जानकारी मिली है तो आज शाम को वह फोन कर के बोली की बेटा 'मैं ज्यादा मजदूरी कर के तुमको पैसे भेजूंगी, लेकिन पुलिस की लाठी खाने मत जाना, मैं अपनी कमाई से ही तुमको मास्टर बनाऊंगी'. पर यह बात माँ को कैसे समझाऊँ की बहुत बच्चे तो एेसे है कि जिनका कोई नहीं हैं और वो उच्च शिक्षा प्राप्त करना चाहते हैं तो उन्हें कौन पढाएगा क्योंकि हमारे यहां तो लोन भी घूस दे कर ही मिलता हैं और फिर जाॅब की भी तो गारंटी नहीं हैं तो फिर क्या करें हम सब, ऊँची शिक्षा का ख्याल छोङ दे! नहीं, नहीं यह हमारे देशहित में नहीं होगा क्योंकि कल से तो फिर नेताजी बोलेंगे की पढ़ाई छोङ दो क्योंकि यहां तो शिक्षा का मोल नहीं हैं. अगर शिक्षा विकास की चिंता होती तो हमारे नेतागण तमाम तरह की अपनी आरामदेह सुख सुविधा का परित्याग कर के उस राशि को शिक्षा के खाते में डाल देते क्योंकि उनके एसी, कुलर, आलीशान गाङीयों के चलने से कही लाख गुना ज्यादा जरूरी हैं, उच्च शिक्षा के कलम को चलाना. फेलोशिप को बंद कर देने से ना देश का शैक्षणिक विकास होगा और ना ही आर्थिक. फेलोशिप को बंद कर के शिक्षा का फालुदा बनाया जा रहा हैं और कुछ भी नहीं. ठीक हैं तो फिर क्या जरूरत हैं एमफिल और पीएचडी की डिग्री हासिल कर के नाम के आगे बोझ लगाने की, उससे अच्छा हैं चलते हैं मैट्रिक पास कर के विदेश या फिर लगाते हैं कोई चाय - पकौड़ी की स्टाॅल किसी कोर्ट - कचहरी या सचिवालय के पास. लेकिन याद रखिए कि आने वाले दिनों में विकास नहीं विनाश होगा और इतना तो हम शिक्षित हैं कि अपने अधिकारों को छिनने नहीं देंगे और ना ही देश को फिर से अनपढ़ होने देंगे. क्योंकि हम ही क्रांतिपूत हैं और हम ही शांतिदूत हैं.
Monday, 23 November 2015
फेलोशिप को फालुदा बनाकर ना खाएँ - "अगर शिक्षा विकास की चिंता होती तो हमारे नेतागण तमाम तरह की अपनी आरामदेह सुख सुविधा का परित्याग कर के उस राशि को शिक्षा के खाते में डाल देते क्योंकि उनके एसी, कुलर, आलीशान गाङीयों के चलने से कही लाख गुना ज्यादा जरूरी हैं, उच्च शिक्षा के कलम को चलाना. फेलोशिप को बंद कर देने से ना देश का शैक्षणिक विकास होगा और ना ही आर्थिक. "
वैसे भी भारत में उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए कौन आगे पढ़ता हैं, क्या दसवीं और क्या पीएचडी सब तो एक ही बराबर हैं क्योंकि जब ग्रुप डी या सी की भर्ती निकलती हैं तो सब के सब एक ही कतार में खड़े हो जाते हैं और जो बचे - खुचे संघर्षरत छात्र - छात्रा हैं वो ही एमफिल व पीएचडी के लिए निकलते हैं ताकि देश - समाज के लिए भी कल्याण हो. हाँ! यह बात अलग है कि कुछ लोग पीएचडी कर के भी पकौङे बेच रहे हैं और एम ए, एमफिल वालों की बात ही छोड़ो वो सब भी कहीं ना कहीं तो खङे मिल जाएंगे और इस बेरोजगार शहर में उम्मीद भी क्या कर सकते हैं क्योंकि यहां तो लोकतंत्र के राजा नौवीं पास हैं तो उन्हें क्या पता हैं कि उच्च शिक्षा नाम की भी कोई चीज होती हैं. अगर उन्हें यह बात पता होता कि शोध शिक्षा के वजह से ही समाज में विकास होगा और वास्तविक परिवर्तन आएगा तो आज फेलोशिप के लिए हमें गुहार ना लगानी पङती. हमारे नेताओं को यह जानकारी होनी चाहिए कि रिजर्व बैंक हो या अन्य विकास की योजना सब तो शोधकर्ताओं की ही देन हैं लेकिन उन्हें यह बात पता कैसे हो क्योंकि वो तो बस जाएंगे रिबन काटेंगे और बस अपने बातों को रखेंगे फिर चलते बनेंगे और हम बुध्दिजीवी बस अपनी बात को आपस में बुदबुदाकर चलते बनेंगे अपने - अपने काम पर. शिक्षा के महत्व को एक शिक्षित व्यक्ति ही समझ सकता हैं लेकिन यहां तो हमारे नेता ही अबूझ हैं तो भला उनको कौन समझाएं. इन लोगों से लाखगुना अच्छी हैं मेरी माँ जो कि अनपढ़ हैं और गरीबी तो खैरात में मिली हैं लेकिन वो अपने हिस्से का सुख त्याग कर के मुझे पढा रहीं हैं ताकि अच्छा इंसान बनूं. जाने कैसे उनको फेलोशिप वाले हङताल के बारे में जानकारी मिली है तो आज शाम को वह फोन कर के बोली की बेटा 'मैं ज्यादा मजदूरी कर के तुमको पैसे भेजूंगी, लेकिन पुलिस की लाठी खाने मत जाना, मैं अपनी कमाई से ही तुमको मास्टर बनाऊंगी'. पर यह बात माँ को कैसे समझाऊँ की बहुत बच्चे तो एेसे है कि जिनका कोई नहीं हैं और वो उच्च शिक्षा प्राप्त करना चाहते हैं तो उन्हें कौन पढाएगा क्योंकि हमारे यहां तो लोन भी घूस दे कर ही मिलता हैं और फिर जाॅब की भी तो गारंटी नहीं हैं तो फिर क्या करें हम सब, ऊँची शिक्षा का ख्याल छोङ दे! नहीं, नहीं यह हमारे देशहित में नहीं होगा क्योंकि कल से तो फिर नेताजी बोलेंगे की पढ़ाई छोङ दो क्योंकि यहां तो शिक्षा का मोल नहीं हैं. अगर शिक्षा विकास की चिंता होती तो हमारे नेतागण तमाम तरह की अपनी आरामदेह सुख सुविधा का परित्याग कर के उस राशि को शिक्षा के खाते में डाल देते क्योंकि उनके एसी, कुलर, आलीशान गाङीयों के चलने से कही लाख गुना ज्यादा जरूरी हैं, उच्च शिक्षा के कलम को चलाना. फेलोशिप को बंद कर देने से ना देश का शैक्षणिक विकास होगा और ना ही आर्थिक. फेलोशिप को बंद कर के शिक्षा का फालुदा बनाया जा रहा हैं और कुछ भी नहीं. ठीक हैं तो फिर क्या जरूरत हैं एमफिल और पीएचडी की डिग्री हासिल कर के नाम के आगे बोझ लगाने की, उससे अच्छा हैं चलते हैं मैट्रिक पास कर के विदेश या फिर लगाते हैं कोई चाय - पकौड़ी की स्टाॅल किसी कोर्ट - कचहरी या सचिवालय के पास. लेकिन याद रखिए कि आने वाले दिनों में विकास नहीं विनाश होगा और इतना तो हम शिक्षित हैं कि अपने अधिकारों को छिनने नहीं देंगे और ना ही देश को फिर से अनपढ़ होने देंगे. क्योंकि हम ही क्रांतिपूत हैं और हम ही शांतिदूत हैं.
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